लोग चाहे जितना भी करीब हो, लेकिन हर कोई अकेला है ज़िंदगी के इस सफर में।

दिन हुआ है, तो रात भी होगी, मत हो उदास, उससे कभी बात भी होगी। वो प्यार है ही इतना प्यारा, ज़िंदगी रही तो मुलाकात भी होगी।

अब मोहब्बत नही रही इस जमाने में, क्योंकि लोग अब मोहब्बत नही मज़ाक किया करते है इस जमाने में।

वक्त के बदल जाने से इतनी तकलीफ नही होती है, जितनी किसी अपने के बदल जाने से तकलीफ होती है।

इंसान की ख़ामोशी ही काफ़ी है, ये बताने के लिये की वो अंदर से टूट चूका है।

मंजिल भी उसकी थी, रास्ता भी उसका था, एक मैं ही अकेला था, बाकि सारा काफिला भी उसका था, एक साथ चलने की सोच भी उसकी थी, और बाद में रास्ता बदलने का फैसला भी उसी का था।

ये न कह मोहब्बत मिलना किस्मत की बात है, क्योंकि मेरी बर्बादी में तेरा भी हाथ है।

"अजीब सा सफर है ये ज़िंदगी, मंज़िल मिलती है मौत के बाद।"

जिसने हमको चाहा उसे हम चाह न सके, और जिसको हमने चाहा उसको हम पा न सके।

खुदा कभी किसी पे फ़िदा न करे, अगर करे भी तो कभी कयामत तक जुदा न करे।